आरक्षण व्यवस्था और सिंधी समुदाय © अतुल राजपाल

भारत सरकार की आरक्षण नीति भारत की जाति प्रथा की विसंगतियों को दूर करने के लिए लागू की गयी थी। इन विसंगतियों को समझने के लिए हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था को समझना बहुत जरुरी है। वैदिक काल मैं व्यक्ति के कर्म से उसका वर्ण निधारण होता था पर कालांतर में वो जन्म के आधार पर होने लगा। समयांतराल मैं भारत की वर्ण व्यवस्था दूषित हो गयी।

वैदिक काल में वर्ण निर्धारण कर्म के आधार पर होता था। उदाहरण के लिए यदि कोई शिक्षा के काम से जीविकोपार्जन करता था तो वो ब्राह्मण होता था और यदि कोई राज्य की संपत्ति और सीमाओं की सुरक्षा के काम को करता था वह क्षत्रिय होता था। इसी प्रकार कोई व्यवसाय करता था वो वैश्य और यदि कोई साफ़- सफाई के काम करता था तो वो शुद्र। लेकिन समयांतराल मैं यह व्यवस्था दूषित हो गयी और यह निर्धारण जन्म के आधार पर होने लगी। सिपाही का बेटा क्षत्रिय, और ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण इत्यादि इत्यादि। और इसी तरह वर्तमान जाती प्रथा का जन्म हुआ।

लेकिन इस जाति प्रथा मैं भी अन्य कई विसंगतियों ने जन्म ले लिया। जो शुद्र थे उनका हजारों सालों तक ऊँची कही जाने वाली जातियों द्वारा शोषण होता रहा।

आजादी के पश्चात हिन्दू धर्म की जातियों की इन विसंगतियों को दूर करने के लिए और शोषित दलित समाज को विकास की मुख्यधारा में लाने और बराबरी का दर्जा दिलवाने के लिए हमारे नीति निर्माताओं ने संविधान मैं आरक्षण की व्यवस्था की।

अब प्रश्न उठता है की सिंधी समाज का इस आरक्षण व्यवस्था से क्या लेना देना है?

देश का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ था। हमारी मातृभूमि सिंध विभाजन के समझौते के तहत इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान के हिस्से में आया था। सिंधी समाज भी हिन्दू धर्म को ही मानता है और हिन्दू होने के वजह से ही हमें “सिंध” अपनी मातृभूमि से “विस्थापित” होना पड़ा और हम अपने ही देश मैं “रिफ्यूजी” हो गए।

यहाँ पर विस्थापित और रिफ्यूजी शब्द का फर्क भी समझना बहुत जरुरी है। रिफ्यूजी वो है जो किन्ही कारणों से जैसे गृह युद्ध, प्राकृतिक आपदा की वजह से अन्य देश की शरण लेने को मजबूर होते हैं उन्हें रिफ्यूजी कहते हैं और उन्हें उस देश जिसकी उन्होंने शरण ली होती है में कोई विशेष अधिकार नहीं होते हैं। वो उस देश के रहमोंकरम पर होते हैं।

विस्थापित वो होते हैं जिन्हें किन्हीं कारणों जैसे सरकार द्वारा किसी परियोजना के लिए उनकी जमीनों का अधिकरण या जैसे हम सिंधियों के केस मैं देश का बटवारा आदि वजहों से अपने ही देश की सीमा मैं अपने जमीन जायदाद को छोड़ दूसरे स्थान पर विस्थापित होना पड़ता है ऐसे व्यक्ति और ऐसे व्यक्तियों का समूह विस्थापित की श्रेणी में आते हैं। ऐसे लोगों के विशेष अधिकार होते हैं। सरकार की ऐसे लोगों की जान-माल की सुरक्षा की संवैधानिक जिम्मेदारी होती है। उनके जमीन-जायदाद का उचित मुवावजा देना पड़ता है। उनकी भाषा संस्कृति की सुरक्षा की संवैधानिक जिम्मेदारी सरकार की होती है। उनको सम्मानजनक जीविका उपलब्ध कराने की भी जिम्मेदारी सरकार की होती है।

तो यह फर्क होता है एक रिफ्यूजी और विस्थापित मैं। चूँकि हम सिंधी भी विस्थापित की श्रेणी में आते हैं अतः हमें ये विशेषाधिकार प्राप्त हैं।

अब आता है सिंधियों के परिप्रेक्ष्य मैं आरक्षण निति का मसला। चूँकि हम सिंधी भी हिन्दू हैं अतः हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था की सभी विसंगतियां हम पर भी लागू होती है और हम सब भी भारत की आरक्षण निति का लाभ ले सकते हैं।

फिर समस्या क्या है?

समस्या यह है की विभाजन के समय हम सिंधी पूरी तरह से तितर-बितर हो गए। हमारा उस समय का नेतृत्व जागरूक और  प्रभावी नहीं था। हम सिंधी संगठित भी नहीं थे और संख्याबल मैं बहुत कम। अशिक्षा चरम पर थी और अस्तित्व का संकट प्रबल था।

वैसे भी विभाजन के पूर्व सिंध मैं कोई बहुत अच्छी स्तिथि नहीं थी। राजा दाहिरसेन जिनकी कहानी हम पढ़ा और सुना करते हैं वो सिंध के आखिरी सशक्त हिन्दू सिंधी राजा थे। सन् 712 ईस्वी मैं उनको शहादत प्राप्त हुई। उसके बाद 300 सालों तक उनके वंशजो और अरब से आये मुस्लिम आक्रमणकारियों के मध्य सत्ता का संघर्ष चलता रहा लेकिन उसके बाद अरब आक्रमणकारी सत्ता पर काबिज हो गए। धीरे धीरे सिंधी हिन्दू सत्ता के प्रमुख प्रभावी पोजिसंस से दूर होते गए। कालान्तर मैं सिंधी हिन्दू पूरी तरह से सत्ता से दूर हो गए और आज तक वही स्तिथि बनी हुई है।

सत्ता मैं होने की महत्वाकांछा तो छोड़िये सत्ता मैं होने के मतलब को भी सिंधी न जानते हैं न जानना चाहते हैं। उनकी पूरी जद्दोजहद अस्तित्ववादी हो गयी है। ऐसा कोई भी कार्य वो नहीं करना चाहते जिसमे शौर्य की आवश्यता हो या अन्य भाषाई समूहों से संघर्ष की सम्भावना हो। उनका पूरा प्रयास बस अपने अस्तित्व को बचाये रखने और अपने भविष्य को संरक्षित करने का रहता है और इस तरह की मानसिकता उनमें विकसित हो गयी है। इसी अज्ञानता मैं सिंधी हिन्दू इस बात को नहीं समझ पाते की सत्ता का क्या महत्व होता। किसी के जान माल की सुरक्षा की जिम्मेदारी प्रसाशक की होती और जो दूसरों को सुरक्षा प्रदान करता है वो ही स्वयं में सबसे शक्तिशाली होता है। आज जो प्रशाशक होता है सबसे पहले उसकी जरूरतों और उसकी सुरक्षा का प्रबंध होता है। इस बात को सिंधी समुदाय समझ नहीं पाता है।

आरक्षण सत्ता तक पहुचने की सबसे आसान सीढ़ी है। विभाजन के समय जो सिंधी समुदाय का जो थोडा बहुत पढ़ा लिखा तबका था उसने इस व्यवस्था का तब भी लाभ लिया और आज भी ले रहा है लेकिन अधिकाँश सिंधी इस बात से अनभिज्ञ हैं की वो भी इस व्यवस्था का लाभ ले कर सत्ता तक अपनी पहुँच बना सकते हैं। बस जरुरत है इस सोते हुए समाज को जगाने की।

आरक्षण का लाभ लेने के लिए जरुरत हैं हमें अपनी सही जाति का ज्ञान हासिल करने की। हम सिंधी अपने सरनेम को अपनी जाती समझने की गलती करते हैं। हमारी जाती तय होती है कि हमारे पुरखे किस रोजगार को पुश्तैनी रूप से करते आये थे। इसको जानने के कई जरिये हैं। पहला उपाय है की हम अपने बड़ों से ये जानने का प्रयास करें की हमारे पुरखो का पुस्तैनी रोजगार क्या था। न पता चलने पर दूसरा उपाय है गया या हरिद्वार में अपने पुश्तैनी पंडित के दस्तावेजों से अपने सही जाति की जानकारी हासिल करना। और यदि दुर्भाग्यवश वहां भी यह जानकारी हासिल न हो पाये तो आखिरी उपाय है सिंध के रेवेन्यु दस्तवजों मैं दाखिल अपने पुरखों की प्रमाणिक जानकारी हासिल करना।

अपनी सही जाति की जानकारी हासिल होने के बाद हमें अपना जाति प्रमाण पत्र बनवाना पड़ेगा। और उसी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर यदि हम आरक्षित जाति के वर्गीकरण में होंगे तो हम आरक्षण का लाभ ले सकते हैं।

लेकिन इसमे एक समस्या है।

चूँकि अधिकाँश सिंधी अब तक आरक्षण का लाभ नहीं लेते आये हैं तो जब हम आरक्षण का लाभ लेने का प्रयास करते हैं तो प्रसाशन और अन्य जातियां इससे भ्रमित हो जाती है की सिंधी कैसे आरक्षण का लाभ ले सकते हैं। वे सभी तो उच्च जातियों से हैं। आजाद भारत मैं अपने उद्यमशीलता और अपने अस्तित्वादि जुझारू प्रकृति की वजह से हम सिंधियों ने बगैर किसी सरकारी संरक्षण के आर्थिक सम्पन्नता हासिल कर ली  बस इसीसे भ्रम की स्तिथि पैदा होती है की सभी सिंधी उच्च जातियों से हैं। इस वजह से कई जगह कभी प्रसाशन द्वारा तो कभी अन्य पिछड़ी जातियों द्वारा अज्ञानतावश या ईर्ष्यावश या असुरक्षा के कारण इसका विरोध किया जाता है जिससे आरक्षण का लाभ लेने मैं रूकावट भी पैदा होती है और और कभी-कभी क़ानूनी उत्पीड़न भी होता है।

तो फिर कैसे सिंधी समाज का वो वर्ग जो पिछड़ी जातियों से आता है और अभी आर्थिक रूप से स्वावलंबी नहीं हो पाया है कैसे इस आरक्षण व्यवस्था का लाभ ले सकता है?

इसके दो उपाय हैं एक राजनितिक और दूसरा विधिक।

राजनितिक उपाय यह है की इस विषय मैं सिंधी समुदाय द्वारा एक राजनितिक आंदोलन खड़ा कर  केंद्र सरकार पर दबाव बनाये जाए ताकि वो इस समस्या का समाधान ढूंढ कर सिंधी समाज को आरक्षण का लाभ दिला सके। इस उपाय से सफलता हासिल होना असंभव तो नहीं लेकिन लगभग असंभव ही है। चूँकि हम सभी बिखरे हुए हैं इसलिए हमारे वोट की कोई ताकत नहीं हैं। राजनीति के क्षेत्र मैं सिंधी समुदाय का प्रतिनिधित्व नगण्य है अतः इस माध्यम से सफलता मिलना मुश्किल है।

दूसरा जो विधिक उपाय है उससे थोड़े प्रयास से सफलता मिल सकती है। हमें सर्वोच्च न्यायलय की शरण में जाना पड़ेगा। चूँकि आरक्षण व्यवस्था हिंदुओं की सभी विभिन्न भाषायी समूहों की सभी पिछड़ी जातियों के लिए है इसलिए हम सर्वोच्च न्यायालय से  मांग कर सकते हैं सिंधी समुदाय की पिछड़ी जातिओं को आरक्षण व्यवस्था का लाभ लेने मैं आ रही दिक्कत्तों को दूर करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देशित किया जाए। क्योंकि हमारा संविधान धर्म, जाति भाषा या अन्य आधार पर किसी भी के साथ पक्षपात नहीं करता है अतः सर्वोच्च न्यायालय हमारी इस न्यायोचित मांग को और वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की इस विसंगति को दूर करने के लिए बाध्य है।

वैसे तो वर्तमान परिदृश्य मैं आरक्षण व्यवस्था खुद मैं ही एक विसंगति है लेकिन जब तक हमारे नीति निर्माता इस विसंगति को दूर नहीं करते तब तक सिंधी समुदाय इसका लाभ लेने से क्यों वंचित रहे।

अतुल राजपाल
अध्यक्ष
सिंध वेलफेयर सोसाइटी
http://www.sindhwelfare.wordpress.com

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7 thoughts on “आरक्षण व्यवस्था और सिंधी समुदाय © अतुल राजपाल

  1. Vikas says:

    जहाँ तक मुझे पता है सिंधी समाज का सिर्फ एक वर्ग जिसे हम “साहेति”के नाम से जानते है obc मतलब अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में आता है ।
    हमने कोशिश करी इसके बारे में जानकारी हासिल करने की परंतु प्रशासन की उदासीनता की वजह से सही जानकारी नहीं मिली।

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  2. SUBASH CHANDER BHIMANI says:

    At this belated stage, I see Sindhi should stand united and help each other where-ever possible. School/ college should be opened where-ever possible and childrens of sindhi community should be given admission on priority with all possible facilities, on the line of Cristian community. Admition to other community wards may also be given on the condition to bear expences of a poor Sindhi student. The co-operative society type arrangement can be made to initiate and gather funds. Rich Sindhi persons can also be approached to help in this work.

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  3. Naveen Vaswani says:

    hum sbko all over india me message fela kr delhi me ek din ka convaction krana chaiye.. jsme jitne b sindhi h jo mla. mp h. sbko bula kr as a guest ek discussion krana chaiye.. jis se pure india me ek massage b bhja ja sakega or ek importnt topic b uth jayega politicians ke bich me.

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  4. Arjun Gehi says:

    I am working as secretary of Industrialist Association at Jalna I want that to unite dindhi community our parents after partition did look For the Government facility now there is time we should look for it

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  5. HARISH KUMAR RAMCHANDANI says:

    SINDHI KA OBC ME SAMAVESH HONE SE IAS EXAM ME ATTEMPT BHI BAD JAYANGE AND AGE LIMIT ME BHI RELAXATION HOGA

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  6. शंकर किंगरानी says:

    आपका सबसे पहला कथन की सत्ता हासिल करें
    मैं इस कथन से सहमत हूँ हम यदि एकजुट हो जाएँ तो हमारे वोट की ताकत को कोई नकार नहीं सकता लेकिन इसके लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी साथ ही साथ कई लोगों को जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी
    यदि इस प्रकार का कोई संघठन बनता है तो मुझे ख़ुशी होगी और किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी निभाने को तैयार हूँ
    शंकर किंगरानी भाटापारा (छ.ग.)
    मेरा संपर्क नं. 09303908880

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